ढपोरशंख की वाणी में पेश है ‘संजय’ गाथा...।
द्वापर युग में महाभारत हुई... उसमें महाराज धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे और संजय को सब कुछ दिख रहा था लेकिन इस कलयुग में आम आदमी पार्टी के संजय सिंह को सब देख रहे हैं और जनता नेत्रहीन है। कौरव-पांडव की तरह आप और भाजपा के कार्यकर्ता और नेता आपसी कलह में जूझ रहे हैं। ढपोरशंख की वाणी में इस बार पेश है ‘संजय’ गाथा...। चर्चा में नाम-संजय सिंह... काम-राजनीतिज्ञ... दल-आम आदमी पार्टी और ‘दाम’ बोले तो रुपये के चक्कर में वह इस समय जबरदस्त चर्चा पा रहे हैं। ढपोरशंख की वाणी में इस बार इनका गुणगान करता हूं। उत्तर प्रदेश में एक जिला है सुलतानपुर, जहां पर संजय सिंह का जन्म हुआ। इत्तफाक की बात है कि यह मेरे भी पूर्वजों का जिला है। यहीं का मैं भी मूल निवासी हूं... खैर, चर्चा हो रही है संजय सिंह की तो मैं कौन हूं.... जनता को क्या मतलब। तो संजय सिंह जी उड़ीसा में स्कूल ऑफ माइनिंग से इंजीनियरिंग से डिप्लोमा करने के बाद वे समाजसेवा के रास्ते राजनीति में आ गए। पंजाब केसरी की एक रिपोर्ट के अनुसार, माइनिंग से इंजीनियरिंग करने के बाद शुरुआती वेतन 25 हजार रुपये महीना होता है और बढ़ते हुए 50 हजार रुपये महीना तक पहु...